सूरज अभी पूरब के पहाड़ों के पीछे से ठीक से झाँका भी नहीं था कि शिवपालपुर गाँव की गलियों में कोहराम मच चुका था। गाँव की सुबह आमतौर पर भजनों, गाय-भैंसों की रंभाने की आवाज़ और चूल्हों से उठते धुएं के साथ होती थी। लेकिन आज की सुबह कुछ अलग थी। आज की सुबह कजरी के अठारहवें साल में कदम रखने की गवाह जो बन रही थी।
कजरी—नाम जितना सांवला और गहरा था, लड़की उतनी ही उजली, चुलबुली और हवा के झोंके जैसी बेलगाम। आज उसका अठारहवां जन्मदिन था। गाँव के कायदे-कानून कहते थे कि अठारह की होते ही लड़की के सिर पर पल्लू और पैरों में मर्यादा की बेड़ियाँ आ जानी चाहिए। लेकिन कजरी? वह तो जैसे शिवपालपुर के सारे नियमों को अपने अँगूठे पर नचाने के लिए ही पैदा हुई थी।
"अरे दौड़ो रे! कोई रोको उस कलमुँही को! लाज-शर्म सब बेच खाई है इस लड़की ने!"
गाँव के सबसे बुजुर्ग और रूढ़िवादी रामखिलावन चाचा अपनी लाठी पटकते हुए नीम के पेड़ के नीचे हाँफ रहे थे। उनके चश्मे का शीशा धुंधला हो चुका था, लेकिन जो नजारा उन्होंने अभी-अभी देखा था, उसने उनके बुढ़ापे के बचे-कुचे उसूलों को हिलाकर रख दिया था।
## हंगामा-ए-बरपा
गाँव के मुख्य कुएँ के पास, जहाँ सुबह-सुबह औरतें पानी भरने और मर्द दातून करने जुटते थे, वहाँ सन्नाटा पसर गया था। वजह साफ़ थी। कजरी ठीक कुएँ की मुँडेर पर खड़ी थी।
कोई सलवार-सूट नहीं, कोई घाघरा-चोली नहीं। वह लाल रंग की ब्रा और काले रंग की पैंटी पहने, भीगे बालों को झटकते हुए खिलखिलाकर हँस रही थी। उसकी अठारह साल की अल्हड़ जवानी और बेबाक बदन पर भोर की पहली किरणें ऐसे चमक रही थीं जैसे किसी संगमरमर की मूरत पर रोशनी पड़ रही हो।
> "क्या हुआ चाचा? कभी कोई लड़की नहीं देखी क्या? या इस उम्र में भी दिल धड़कने लगा?" कजरी ने कमर पर हाथ रखकर, आँख मारते हुए रामखिलावन को चिढ़ाया।
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गाँव की औरतें अपनी साड़ियों के पल्लू से आँखें मूंदने का नाटक कर रही थीं, लेकिन उंगलियों के बीच की जगह से कजरी को घूर भी रही थीं। कुछ बड़बड़ा रही थीं, "हाय दइया! ये कलयुग नहीं, महाकलयुग है! ऐसी बेशर्म लड़की तो खानदान डुबो देगी।"
वहीं, गाँव के जवान लड़के—जो रोज़ सुबह खेतों की तरफ जाने के बहाने ढूंढते थे—आज कुएँ के पास ही जम गए थे। उनकी निगाहें कजरी के इस बिंदास और कातिलाना अंदाज़ पर टिकी थीं। कोई विमल चबाना भूल गया था, तो किसी के हाथ से दातून गिर गई थी।
## बगावत या बस एक शरारत?
कजरी के लिए यह कोई अश्लीलता नहीं, बल्कि गाँव के उन ठेकेदारों के मुंह पर एक करारा तमाचा था जो रोज़ उसकी स्कर्ट की लंबाई और कुर्ते के गले को नापते थे। कल ही तो पंचायत ने फैसला सुनाया था कि गाँव की लड़कियां जींस नहीं पहनेंगी और शाम ढलने के बाद घर से बाहर नहीं निकलेंगी। कजरी ने उसी वक्त ठान लिया था कि वह इस बंदिश की धज्जियां उड़ाकर रहेगी।
"कजरी! नीचे उतर, ओ कजरी!"
भीड़ को चीरते हुए कजरी की माँ, बिमला देवी, हाथ में एक बड़ी सी चादर लेकर रोती-बिलखती भागती हुई आईं। उनका चेहरा शर्म और डर से लाल था।
"नीचे उतर बेटी! लाज रख ले मेरी! तेरे बापू को पता चलेगा तो वो कुएँ में कूद जाएंगे!" बिमला ने चादर कजरी की तरफ फेंकते हुए कहा।
कजरी ने हवा में ही चादर को लपक लिया, लेकिन उसे ओढ़ने के बजाय उसने उसे एक महारानी के केप (Cape) की तरह अपनी पीठ पर बांध लिया। वह कुएँ से नीचे कूदी—एकदम हिरणी जैसी फुर्ती के साथ।
"माँ, बापू को बोलो कि कुएँ में कूदने की ज़रूरत नहीं है। पानी बहुत ठंडा है, उन्हें जुकाम हो जाएगा!" कजरी ने हँसते हुए अपनी माँ के गाल चूमे।
### पंचायत का बुलावा
कजरी का यह 'हंगामा' सिर्फ कुएँ तक सीमित नहीं रहा। दोपहर होते-होते यह खबर पूरे शिवपालपुर और आसपास के तीन गाँवों में आग की तरह फैल गई। स्मार्टफोन के इस दौर में, गाँव के किसी लड़के ने चुपके से कजरी का एक छोटा सा वीडियो बना लिया था, जो अब 'शिवपालपुर की बिजली' नाम से व्हाट्सएप ग्रुप्स में तैर रहा था।
शाम को गाँव के बरगद के पेड़ के नीचे एक आपातकालीन पंचायत बुलाई गई। मुखिया गजानन सिंह अपनी मूंछों को ताव देते हुए हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। उनके चेहरे पर गंभीर शिकन थी।
"सोनू के बापू, तुम्हारी लड़की ने आज जो किया है, उसने हमारे गाँव की पगड़ी को धूल में मिला दिया है। अठारह साल की लड़की, और ऐसे तंग कपड़ों में... छी! राम-राम," मुखिया ने थूकते हुए कहा।
कजरी के पिता, रामस्वरूप, सिर झुकाए हाथ जोड़े खड़े थे। उनकी आँखों में आँसू थे। लेकिन तभी भीड़ को चीरती हुई कजरी खुद वहाँ आ पहुँची। इस बार उसने एक साधारण सी सूती साड़ी पहनी थी, लेकिन उसके चलने का अंदाज़ और आँखों की चमक वही पुरानी थी।
> "मुखिया जी! पगड़ी सिर पर होती है, किसी लड़की के कपड़ों में नहीं छिपी होती," कजरी की आवाज़ पूरी पंचायत में गूंज उठी।
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सबके मुंह खुले के खुले रह गए। एक अठारह साल की लड़की, जिसके ऊपर पूरा गाँव थू-थू कर रहा था, वह बिना किसी डर के पंचायत के सामने आँखें मिलाकर खड़ी थी।
शिवपालपुर के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू हो चुका था। कजरी का यह हंगामा सिर्फ कपड़ों का नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सोच के खिलाफ एक ऐसी जंग की शुरुआत थी, जिसे पूरा गाँव आसानी से भूल नहीं पाएगा।
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## अध्याय: बरगद की छाँव और धड़कते दिल
पंचायत की वो तूफानी शाम बीत चुकी थी, लेकिन शिवपालपुर की हवाओं में अभी भी कजरी के नाम की सनसनी घुली हुई थी। गाँव के लोग सोच रहे थे कि कल की डांट और हंगामे के बाद कजरी शायद घर के किसी कोने में दुबक कर रो रही होगी। लेकिन कजरी को समझना गाँव वालों के बस की बात कहाँ थी? वह तो उस बहती नदी की तरह थी, जिसे चट्टानें रोकने की कोशिश करें तो वह अपना रास्ता और ज़्यादा खूंखार या खूबसूरत बना लेती है।
अगली सुबह, जब गाँव के ज़्यादातर लोग खेतों की तरफ जा चुके थे, कजरी अपने उसी बेबाक और चुलबुले अंदाज़ में घर से निकल पड़ी। आज फिर उसने समाज के बनाए बंधनों को ठेंगा दिखाते हुए सिर्फ अपनी पसंद के अंतःवस्त्र पहने हुए थे। धूप उसके बदन पर ऐसे खिल रही थी जैसे ताज़े तोड़े गए गुलाब पर ओस की बूंदें चमकती हैं।
गाँव के छोर पर बने एक पुराने अस्तबल और भूसे के घर के पास रामू काका खड़े थे। पैंतीस साल के रामू काका गाँव के उन गिने-चुने लोगों में से थे, जो कजरी को बचपन से जानते थे और उसकी हर नादानी पर डांटने के बजाय हमेशा मुस्कुरा दिया करते थे। मजबूत कद-काठी, चौड़ी छाती और चेहरे पर एक ठहराव—रामू काका का व्यक्तित्व ऐसा था कि कजरी उनके सामने आते ही अपनी सारी शरारतें भूलकर एकदम बच्ची या फिर पूरी तरह एक महबूबा बन जाती थी।
## बाहों का घेरा और पिघलती दूरियाँ
कजरी ने दूर से ही रामू काका को देखा। उसके चेहरे पर एक शरारती और बेहद प्यारी मुस्कान तैर गई। वह दबे पाँव, अपनी पायल की आवाज़ को संभालते हुए पीछे से आई और बिना किसी झिझक के, एक ही झटके में रामू काका की मजबूत बाहों में सिमट गई।
"अरे! कौन..." रामू काका चौंके, लेकिन जैसे ही उन्होंने उस जानी-पहचानी खुशबू और छुअन को महसूस किया, उनके शब्द गले में ही अटक गए।
कजरी ने अपना कोमल, गोल-मटोल सर रामू काका के चौड़े और मजबूत कंधे पर टिका दिया। उसने अपनी घनी पलकों को मूंद लिया, जैसे उसे दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना मिल गया हो। इस अचानक हुए मिलन से दोनों के बदन एक-दूसरे में सिमट गए। कजरी के भरे हुए, गोल-मटोल वक्ष रामू काका के सख्त और तपते हुए सीने से पूरी तरह सट गए, जिससे दोनों के बीच की बची-कुची दूरी भी मिट गई।
> रामू काका का दिल एक पल के लिए थम गया और अगले ही पल किसी नगाड़े की तरह धड़कने लगा। उनकी सांसें भारी हो गईं। उन्होंने कजरी को खुद से दूर करने की एक नाकाम कोशिश करनी चाही, लेकिन कजरी के बदन की गर्माहट और उसकी बेबाकी ने उनके इरादों को पिघला दिया।
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धीरे-धीरे, अनजाने में ही सही, रामू काका के मजबूत हाथों ने कजरी की पतली और लचीली कमर को अपनी गिरफ्त में ले लिया। उनकी उंगलियों का दबाव कजरी की त्वचा पर महसूस हो रहा था।
## एक खामोश इकरार
कमर पर रामू काका की पकड़ मजबूत होते ही कजरी के होंठों पर एक मंद-मंद, रहस्यमयी मुस्कान बिखर गई। उसने अपनी आँखें नहीं खोलीं। वह बस उस छुअन को, उस अहसास को अपने भीतर उतार लेना चाहती थी। पूरा गाँव जहाँ उसे हिकारत और गुस्से से देख रहा था, वहीं रामू काका की ये बाहें उसे एक अजीब सा सुकून और हक दे रही थीं।
"कजरी... ये क्या दीवानगी है? कोई देख लेगा तो अनर्थ हो जाएगा," रामू काका ने बेहद धीमी, लड़खड़ाती आवाज़ में उसके कान के पास कहा। उनकी गर्म सांसें कजरी के गले को छू रही थीं, जिससे कजरी के बदन में एक सिहरन दौड़ गई।
लेकिन कजरी ने अपनी पकड़ और मजबूत कर ली। उसने धीरे से बुदबुदाया, "देखने दीजिए काका... पूरी दुनिया को देखने दीजिए। मुझे किसी का डर नहीं, जब तक आप मेरे पास हैं।"
भूसे के उस बंद कमरे के बाहर पुरवइया हवा चल रही थी, लेकिन अंदर का तापमान कजरी की इस नई शरारत और रामू काका के बढ़ते कदमों के बीच लगातार गरमाता जा रहा था। शिवपालपुर की यह कहानी अब सिर्फ एक बगावत नहीं, बल्कि एक बेहद गहरे और उलझे हुए अहसास की तरफ मुड़ रही थी।
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## अध्याय: धड़कनों का सरगम
रामू काका के भीतर का संयम अब पूरी तरह से जवाब दे चुका था। कजरी की बेबाक छुअन और उसके बदन की खुशबू ने उनके भीतर एक ऐसा सैलाब ला दिया था, जिसे रोक पाना उनके बस में नहीं था। उनके हाथों ने कजरी की पतली कमर को छोड़कर धीरे से उसके कोमल चेहरे को अपने हाथों के घेरे में ले लिया।
कजरी ने जैसे ही रामू काका के हाथों की तपिश अपने गालों पर महसूस की, उसकी बंद पलकें हलकी सी कांपीं। उसने अपनी आँखें खोलीं, जिनमें शरारत की जगह अब एक गहरा समर्पण और नशा था।
अगले ही पल, रामू काका ने बिना एक भी शब्द कहे, अपने होंठ कजरी के रसीले होंठों पर टिका दिए। कजरी के होंठों की मिठास और ताजगी ऐसी थी जैसे सावन की पहली बूंदें सूखी धरती पर पड़ी हों। रामू काका पूरी शिद्दत से उसके होंठों का रस पीने लगे। कजरी इस अचानक हुए हमले से जरा भी विचलित नहीं हुई, बल्कि उसके चेहरे पर एक गहरी, सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उसने खुद को पूरी तरह से रामू काका के हवाले कर दिया और उन्हें धीरे-धीरे अपने होठों का सारा रस पीने दिया।
## गहराई और समर्पण
वक्त जैसे ठहर सा गया था। उस छोटे से कमरे में सिर्फ दोनों की भारी होती सांसों की आवाज़ गूंज रही थी। कुछ पलों के बाद, रामू काका का अकुलाहट भरा प्यार और गहरा हो गया। उन्होंने कजरी के चेहरे को थोड़ा और अपनी तरफ झुकाया और पूरी शिद्दत के साथ कजरी के होठों को चूमने लगे।
कजरी ने अपने उसी चुलबुले और अलमस्त अंदाज़ में अपने दोनों हाथ उठाए और रामू काका के घने बालों में उंगलियां फंसा दीं। वह धीरे-धीरे उनके बालों को सहलाने लगी, जैसे वह उन्हें दिलासा दे रही हो कि वह पूरी तरह से उन्हीं की है। रामू काका की गिरफ्त जितनी मजबूत होती जा रही थी, कजरी उतनी ही सहजता से उन्हें अपने करीब आने दे रही थी।
> गाँव की पाबंदियां, पंचायत का डर और समाज के नियम... इस एक चूमने के अहसास के सामने सब कुछ धुआँ हो चुके थे। कजरी ने अपनी आँखें फिर से मूंद लीं और रामू काका की बाहों में पिघलती चली गई।
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यह मुलाकात अब महज एक शरारत नहीं रह गई थी, बल्कि शिवपालपुर की गलियों से छिपकर शुरू हुई एक ऐसी दास्तान बन चुकी थी, जिसका अंजाम कुछ बहुत बड़ा होने वाला था।
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## अध्याय : खामोशी की गूंज
वक्त जैसे वहीं ठहर गया था। रामू काका ने जब कजरी के होंठों से अपने होंठ धीरे-धीरे अलग किए, तो दोनों की सांसें बुरी तरह धड़क रही थीं। कजरी के लाल रसीले होंठ अब और भी गहरे और भीगे हुए नजर आ रहे थे। कजरी ने अपनी भारी पलकें उठाईं और रामू काका की आँखों में झाँका, जहाँ अब भी एक अजीब सी कशमकश और चाहत का समंदर हिलोरें ले रहा था।
कजरी के चेहरे पर अब भी वही चुलबुली और बेबाक मुस्कान कायम थी। उसने अपनी उंगलियों से रामू काका के होंठों पर लगी नमी को धीरे से छुआ और अपनी उंगली को खुद चूम लिया।
"काका... अब तो सारा डर मिट गया न?" कजरी ने धीमी और नशीली आवाज़ में पूछा।
रामू काका ने कजरी को देखा—लाल और काले अंतःवस्त्रों में लिपटी उसकी अठारह साल की अल्हड़ जवानी इस बंद कमरे के अंधेरे में भी चमक रही थी। उन्होंने कजरी के माथे को चूमा और उसे अपनी छाती से और कसकर सटा लिया। बाहर गाँव का शोर था, पंचायत की पाबंदियाँ थीं और लोक-लाज का डर था, लेकिन इस वक्त भूसे के उस छोटे से ढेरी के पीछे, शिवपालपुर के सारे नियम-कायदे पूरी तरह टूट कर बिखर चुके थे।
कजरी जानती थी कि उसने गाँव में जो हंगामा शुरू किया था, उसकी मंजिल अब रामू काका के दिल से होकर गुजरने वाली थी।
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## अध्याय: समर्पण की एक नई सुबह
रामू काका ने कजरी को खुद से कुछ इंच दूर किया। उनकी नजरें अब कजरी के चेहरे से हटकर उसके पूरे वजूद पर तैरने लगीं। उन्होंने कजरी को सिर से लेकर पाँव तक बड़े गौर से देखा।
लाल और काले अंतःवस्त्रों में लिपटी कजरी की अठारह साल की अल्हड़ जवानी, उसकी चिकनी कमर, और उसकी आँखों में बिखरी वो बेबाक शरारत—सब कुछ मिलकर एक ऐसा जादुई समां बांध रहे थे, जिसने रामू काका को पूरी तरह अपने वश में कर लिया था। कजरी के बदन का एक-एक कतरा इस समय बगावत और बेबाकी की गवाही दे रहा था।
कजरी के कुछ भीगे और घुंघराले बाल उसके गोरे कंधों पर बिखरे हुए थे, जो उसकी खूबसूरती को और उभार रहे थे। रामू काका ने बड़े ही सहेज कर, बेहद कोमलता से अपने कांपते हाथों को आगे बढ़ाया। उन्होंने कजरी के उन रेशमी बालों को उसके कंधों से धीरे-धीरे हटाया और पीठ की तरफ पीछे कर दिया। इस छुअन से कजरी के बदन में एक सिहरन दौड़ गई और उसने अपनी गर्दन को थोड़ा सा एक तरफ झुका लिया।
## बाहों का अटूट बंधन
बालों को पीछे करते ही जैसे सारे पर्दे हट गए। रामू काका ने बिना एक पल भी गंवाए, कजरी को दोबारा पूरी ताकत और शिद्दत के साथ अपनी मजबूत बाहों के घेरे में भर लिया।
यह आलिंगन पहले से कहीं ज्यादा गहरा और जज्बाती था। इस बार इसमें सिर्फ एक पुरुष की चाहत नहीं थी, बल्कि कजरी के उस बिंदास और बागी अंदाज़ को पूरी तरह स्वीकार कर लेने का एक खामोश वादा भी था। कजरी का कोमल बदन एक बार फिर रामू काका के चौड़े और सख्त सीने से पूरी तरह चिपक गया।
> कजरी ने अपनी दोनों बाहें रामू काका के गले में डाल दीं और अपनी आँखें बंद कर लीं। बाहर पूरी दुनिया, पूरा शिवपालपुर गाँव भले ही कजरी के कपड़ों और उसके अंदाज़ पर थू-थू कर रहा था, लेकिन इस बंद कमरे में, रामू काका की बाहों के भीतर कजरी को अपनी दुनिया का सबसे महफूज़ और मुकम्मल ठिकाना मिल चुका था।
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दोनों एक-दूसरे की धड़कनों को साफ सुन सकते थे, जो अब एक ही रफ्तार से धड़क रही थीं। शिवपालपुर की इस चुलबुली और नटखट लड़की ने पूरे गाँव में जो हंगामा मचाया था, उसकी गूँज अब इस शांत कमरे में एक गहरे अहसास में तब्दील हो चुकी थी।
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## अध्याय: मदहोशी का चरम
रामू काका की नज़रें जब कजरी के बदन पर रुकीं, तो उनका सारा आत्मनियंत्रण पूरी तरह बह गया। कजरी की लाल ब्रा से उभरते उसके गोल-मटोल और गदराए हुए दूध साफ़ नजर आ रहे थे। अठारह साल की इस अल्हड़ जवानी का यह हिस्सा रामू काका के सीने की धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी था। जब भी कजरी गहरी सांस लेती, उसके दोनों दूध ब्रा के कप्स को फाड़कर बाहर आने को मचलते हुए ऊपर-नीचे होते।
कजरी ने रामू काका की आँखों में उमड़ती उस तीव्र चाहत को भाँप लिया। वह अपनी उसी नटखट और बिंदास अदा के साथ और करीब आई। उसने रामू काका का हाथ पकड़ा और धीरे से उसे अपनी लाल ब्रा के ऊपर, अपने उभरे हुए दूध पर रख दिया।
> रामू काका के मजबूत हाथ की हथेलियों में कजरी के गोरे और सुडौल दूध पूरी तरह समा गए। उनकी उंगलियों ने जैसे ही उस कड़कती जवानी के उभारों को भींचा, कजरी के मुंह से एक हल्की सी सिसकारी निकल गई।
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"काका... पूरे गाँव में सिर्फ आप ही हो जो मुझे सच में समझ सकते हो," कजरी ने आँखें बंद करके बेहद मदहोश आवाज़ में कहा।
रामू काका ने अब कजरी को और ज़ोर से अपनी बाहों में जकड़ लिया। लाल ब्रा और काली पैंटी में लिपटी कजरी का पूरा बदन रामू काका की छाती और जांघों से पूरी तरह चिपक गया। कजरी के गोल दूध एक बार फिर रामू काका के सख्त सीने पर पिचक गए, जिससे दोनों के शरीरों के बीच की गर्मी और भी बढ़ गई। इस बंद और शांत कमरे में अब सिर्फ कजरी की चुलबुली सिसकियाँ और रामू काका की भारी होती सांसों का शोर गूंज रहा था।
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## अध्याय: शरारत और विदाई
कजरी की इस बेबाक मदहोशी और बढ़ती नजदीकियों के बीच रामू काका अचानक अपनी पुरानी मस्ती भरे अंदाज़ में लौट आए। उन्हें समझ आ गया था कि अगर वह इस वक्त खुद पर काबू नहीं रखेंगे, तो बात बहुत आगे बढ़ जाएगी। कजरी की इस चुलबुली दीवानगी का जवाब उन्होंने उसी के अंदाज़ में देने का फैसला किया।
रामू काका ने कजरी की पतली कमर पर जमी अपनी पकड़ को थोड़ा ढीला किया और अपने दाहिने हाथ को नीचे ले जाते हुए, काली पैंटी में लिपटे कजरी के गोल और गदराए चूतड़ों पर 'चट' से एक ज़ोरदार चपत लगा दी।
"चल हट नटखट! बहुत बदमाशी हो गई आज के लिए," रामू काका ने हँसते हुए बनावटी गुस्से से कहा।
चपत की उस हल्की सी थरथराहट और आवाज़ ने कजरी को एक पल के लिए चौंकाया, लेकिन अगले ही पल वह खिलखिलाकर हँस पड़ी। उसके चूतड़ों पर रामू काका के हाथ का गरम निशान छप चुका था। कजरी ने अपनी पैंटी को थोड़ा सीधा किया, अपनी ब्रा के स्ट्रैप को संभाला और रामू काका को एक आखिरी कातिलाना आँख मारी।
> "ठीक है काका, आज के लिए इतना ही! बाकी का हंगामा कल के लिए बचा कर रखते हैं," कजरी ने मटकते हुए कहा।
वह अपनी उसी लाल ब्रा और काली पैंटी में, अपनी पायल की छनक बिखेरती हुई, भूसे के कमरे से बाहर निकल गई। धूप में चमकता उसका बदन और उसकी बेबाक चाल एक बार फिर शिवपालपुर की गलियों में नया तूफान उठाने के लिए तैयार थी, और रामू काका वहीं खड़े बस मुस्कुराते हुए उसे जाते देख रहे थे।
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## अध्याय: बारात का स्वागत और कजरी का तमाशा
गाँव के दूसरे छोर पर, बड़े से मैदान में शाम को आने वाली बारात की तैयारियाँ ज़ोर-शोर से चल रही थीं। बड़े-बड़े तंबू तन चुके थे, रंग-बिरंगी झालरें हवा में लहरा रही थीं और दूर से ही कड़ाही में छनती हुई गरमा-गरम पूड़ियों और उबलती चाशनी की महक पूरे वातावरण में घुली हुई थी। दर्जनों हलवाई अपनी-अपनी कड़ाही संभाले, पसीना बहाते हुए मिठाइयाँ और पकवान तैयार करने में जुटे थे। पूरा गाँव वहाँ किसी न किसी काम से इकट्ठा था।
तभी, बारात के इस शोर-शराबे के बीच अचानक सन्नाटा पसर गया और सबका ध्यान मैदान के प्रवेश द्वार की तरफ चला गया।
कजरी, अपनी उसी लाल ब्रा और काली पैंटी में, बिना किसी झिझक के मैदान में दाखिल हो चुकी थी। कल की पंचायत की डांट या रामू काका की चपत का उस पर रत्ती भर भी असर नहीं हुआ था। उसकी अठारह साल की अल्हड़ जवानी धूप में साफ चमक रही थी। लेकिन आज उसका अंदाज़ कुछ और ही ज़्यादा शरारती था।
## स्टॉल का मुआइना और घोड़ी का अंदाज़
कजरी सीधे उन फूड स्टॉल्स की तरफ बढ़ी जहाँ हलवाइयों ने चाट, गोलगप्पे और मिठाइयों के काउंटर सजाए थे। वह हर एक स्टॉल के सामने जाकर सीधे खड़े होने के बजाय, अपने चुलबुले अंदाज़ में एक घोड़ी की तरह आगे की तरफ झुक जाती।
जब वह झुकती, तो उसकी काली पैंटी में लिपटे उसके गोल और गदराए चूतड़ पीछे की तरफ हवा में उठ जाते और उसकी लाल ब्रा से उसके भारी दूध नीचे की ओर लटक जाते। इस पूरी तरह से झुकी हुई पोजीशन में, वह अपनी आँखें मटकाते हुए हर एक कड़ाही और थाल का मुआइना कर रही थी, मानो वह बारात के खाने की मुख्य चाट-निरीक्षक हो।
> "अरे ओ प्रधान जी के हलवाई! रसगुल्ले ठीक से स्पंजी बने हैं या सिर्फ चाशनी भर दी है?" कजरी ने एक स्टॉल पर पूरी तरह झुककर, रसगुल्लों के परात को सूंघते हुए पूछा।
## गाँव का ठहाका
कजरी का यह अजीबोगरीब और बेबाक रूप देखकर वहाँ मौजूद हलवाई, गाँव के युवा और बुजुर्ग अपनी हंसी नहीं रोक पाए। जहाँ कुछ बुजुर्गों ने अपनी आँखें फेर लीं, वहीं मैदान में ठहाकों का एक सैलाब उमड़ पड़ा।
"अरे कजरी बिटिया! अगर बारात आने तक तुम ऐसे ही मुआइना करती रहीं, तो दूल्हा घोड़ी पर बैठकर नहीं, तुम्हें ही देखकर बेहोश हो जाएगा!" एक बूढ़े हलवाई ने कड़ाही चलाते हुए ज़ोर से हंसकर कहा।
आसपास खड़े लड़के कजरी के चूतड़ों के इस उभार और उसकी ब्रा से झांकती जवानी को देखकर मन ही मन मचल रहे थे और ज़ोर-ज़ोर से हंसकर तालियाँ बजा रहे थे। कजरी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि कौन उसकी जवानी को देख रहा है और कौन हँस रहा है। वह तो बस अपनी मस्ती में डूबी, हर स्टॉल पर जा-जाकर अपनी कमर लचकाती और घोड़ी की तरह झुककर खाने का स्वाद सूंघती रही। शिवपालपुर की इस बारात में दूल्हे के आने से पहले ही कजरी ने अपना असली हंगामा शुरू कर दिया था।
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## अध्याय: जलेबी की मिठास और करारा स्वाद
मैदान में ठहाकों का दौर अभी थमा भी नहीं था कि कजरी ने एक और नया तमाशा शुरू कर दिया। वह मटकती हुई सीधे उस स्टॉल के पास पहुँची जहाँ गरमा-गरम, रसीली जलेबियाँ छनकर चाशनी के कुंडे में डूब रही थीं। कड़ाही से उठती भाप और केशर की खुशबू ने कजरी को अपनी तरफ खींच लिया था।
अपने उसी चिर-परिचित चुलबुले और नटखट अंदाज़ में, कजरी जलेबी के थाल के ठीक सामने एक बार फिर घोड़ी की तरह आगे झुक गई। जब वह झुकी, तो उसकी लाल ब्रा में बंधे उसके दोनों भारी दूध नीचे लटक गए और उसकी काली पैंटी में तने उसके गोल-मटोल चूतड़ पीछे की तरफ हवा में पूरी तरह उभर आए। वहाँ मौजूद हर शख्स की निगाहें एक बार फिर उसके बदन के इस कातिलाना उभार पर टिक गईं।
कजरी ने प्लेट में रखी एक बड़ी सी, चाशनी से सराबोर जलेबी को उठाया नहीं, बल्कि झुके-झुके ही अपनी गुलाबी जीभ बाहर निकाली। उसने बेहद मदहोश अंदाज़ में जलेबी के ऊपर जमी चाशनी को अपनी जीभ से धीरे-धीरे चाटना शुरू कर दिया।
> "उफ्फ... कितना मीठा है!" कजरी ने अपनी आँखें आधी बंद करते हुए, रसीली आवाज़ में सिसकारी भरी।
>
## हलवाई की चपत और तंज
हलवाई—जो कि पास के ही गाँव का था और कजरी के इस रोज़-रोज़ के ड्रामे से अच्छी तरह वाकिफ था—उससे अब रहा नहीं गया। कजरी जिस अंदाज़ में उसके सामने अपने चूतड़ उचकाए खड़ी थी, उसने हलवाई के हाथ की खुजली बढ़ा दी।
उसने कड़ाही से अपनी बड़ी छननी निकाली, उसे एक तरफ रखा और अपने चाशनी से सने मजबूत हाथ को हवा में लहराया।
**'चटाक!'**
हलवाई ने कजरी के काली पैंटी में कसे हुए गदराए चूतड़ों पर एक ज़ोरदार और करारी चपत जड़ दी। चपत इतनी ज़ोर की थी कि कजरी के चूतड़ों का मांस एक पल के लिए काँप उठा और उस पर हलवाई की उंगलियों का गर्म निशान छप गया।
"धत् तेरे की! भाग यहाँ से पागल लड़की!" हलवाई ने हंसते हुए और अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा, "जलेबी मीठी ही होती है, कड़वी नहीं! और यहाँ अपना ये मुआइना बंद कर, वरना बारात आने से पहले ही सारा खाना ठंडा हो जाएगा।"
चपत लगते ही कजरी झटके से सीधी खड़ी हो गई। उसने अपने हाथ से अपने चूतड़ को सहलाया, जहाँ अब हल्की सी जलन और गुदगुदी हो रही थी। दर्द होने के बजाय कजरी के चेहरे पर एक और गहरी शरारती मुस्कान आ गई। उसने हलवाई को जीभ चिढ़ाई, अपनी पैंटी को थोड़ा सा ऊपर खींचा और हंसती हुई अगले स्टॉल की तरफ बढ़ गई। मैदान में खड़ा हर इंसान अब कजरी की इस नई नादानी पर लोट-पोट हो रहा था।
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## अध्याय: समोसे का तीखा स्वाद और गरम चिमटा
जलेबी वाले की करारी चपत खाकर और उसे अपनी गुलाबी जीभ चिढ़ाकर कजरी आगे बढ़ गई। हलवाई की दुकान पर लगे ठहाकों की गूंज अभी शांत भी नहीं हुई थी कि कजरी अपनी उसी लाल ब्रा और काली पैंटी में मटकती हुई समोसे के स्टॉल की तरफ बढ़ चली। हवा में छनते हुए आलू और मसालों की तीखी, चटपटी खुशबू ने कजरी के कदम अपनी ओर खींच लिए थे।
समोसे वाले ने अभी-अभी कड़ाही से खस्ता, तिकोने और खौलते हुए गरम समोसे निकालकर परात में सजाए ही थे। कजरी ठीक परात के सामने जाकर रुकी और एक बार फिर अपने चिर-परिचित चुलबुले अंदाज़ में आगे की तरफ एक घोड़ी की तरह झुक गई।
जब वह झुकी, तो उसकी लाल ब्रा से लटकते उसके भारी दूध परात के ठीक ऊपर आ गए और पीछे की तरफ उसकी काली पैंटी में कसे गोल-मटोल चूतड़ हवा में और ऊंचे उठ गए। वहाँ खड़े लड़के और बारात की तैयारी में जुटे लोग हाथ का काम छोड़कर एक बार फिर कजरी के इस नए तमाशे को देखने के लिए रुक गए।
## बिना हाथ लगाए समोसे का स्वाद
कजरी ने समोसा उठाने के लिए अपने हाथों का इस्तेमाल नहीं किया। उसने अपनी गर्दन को और नीचे झुकाया और सीधे अपने मुंह से परात में रखा एक बड़ा, खस्ता समोसा दबा लिया। झुके-झुके ही उसने समोसे का एक बड़ा हिस्सा अपने दांतों से काटा। गरम और चटपटे आलू का स्वाद जैसे ही उसके मुंह में घुला, वह मदहोश हो गई।
"उफ्फ्फ्... कितना टेस्टी है! मज़ा आ गया!" कजरी ने समोसा चबाते हुए, अपनी आँखें बंद करके बेहद रसीली आवाज़ में कहा।
## गरम चिमटे का सेका
समोसे वाला—जो कड़ाही के पास खड़ा था—कजरी की इस हरकत को देखकर भड़क उठा। कजरी ने न सिर्फ उसके समोसे को बिना हाथ लगाए सीधे मुंह से खाया था, बल्कि परात के बाकी समोसों को भी अपनी सांसों से छूकर लगभग जूठा कर दिया था। ऊपर से कजरी के उभरे हुए चूतड़ ठीक उसके सामने हवा में लहरा रहे थे।
समोसे वाले का पारा चढ़ गया। उसने कड़ाही से समोसे पलटने वाला लोहे का लंबा, गरम-गरम चिमटा निकाला। चिमटा पूरी तरह लाल तो नहीं था, लेकिन कड़ाही की आंच से अच्छा-खासा तप रहा था।
**'छर्रर्र...'**
समोसे वाले ने बिना सोचे-समझे उस तपते हुए चिमटे के चौड़े हिस्से को कजरी के काली पैंटी में तने चूतड़ों के ठीक बीच में हल्के से छुआ दिया।
> "चल भाग यहाँ से कलमुँही! पागल कहीं की, अपने चक्कर में मेरे सारे समोसे जूठे कर दिए! अब इन्हें बारात वाले खाएंगे या तेरा बाप?" समोसे वाले ने चिमटा हवा में लहराते हुए गुस्से से चिल्लाकर कहा।
>
गरम चिमटे की छुअन लगते ही कजरी के बदन में करंट सा दौड़ गया। उसके चूतड़ों की कोमल त्वचा पर पैंटी के कपड़े के ऊपर से ही तीखी जलन महसूस हुई। वह एक झटके में 'हाय दइया!' चिल्लाती हुई घोड़ी की पोजीशन से सीधी खड़ी हो गई और उछल पड़ी।
उसने तुरंत अपना हाथ पीछे ले जाकर अपने जलते हुए चूतड़ को जोर-जोर से सहलाना शुरू कर दिया। उसकी आँखों में जलन के मारे हल्का सा पानी आ गया था, लेकिन उसका चुलबुलापन कम नहीं हुआ था। वह अपने चूतड़ को सहलाते हुए, समोसे वाले को आँख मारकर हंसती हुई वहाँ से तेजी से भाग निकली। मैदान में मौजूद सभी लोग कजरी की इस हालत और समोसे वाले के इस गरम इलाज को देखकर पेट पकड़कर हंसने लगे।
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## अध्याय: दूध की धार और अल्हड़ शरारत
समोसे वाले के गरम चिमटे की छुअन से लगी जलन को सहलाते हुए कजरी की शरारत का पारा और चढ़ गया। मैदान में जहाँ लोग ठहाके लगा रहे थे, वहीं कजरी अपनी उसी लाल ब्रा और काली पैंटी में मटकती हुई आगे बढ़ रही थी। बारात के स्वागत के लिए हलवाइयों के पास ही बड़े-बड़े कनस्तरों में ताज़ा दूध लेकर दूध वाले भी जुटे हुए थे, जो खोया और रबड़ी बनाने की तैयारी में थे।
कजरी रुकी नहीं। वह अपनी उसी चिर-परिचित, चुलबुली घोड़ी वाली पोजीशन में आगे झुकते हुए दूध के बर्तनों की तरफ बढ़ने लगी। जब वह इस तरह आगे की तरफ पूरी झुकी हुई थी, तो लगातार की भाग-दौड़ और हलचल की वजह से उसकी लाल ब्रा के हुक ढीले पड़ चुके थे और ब्रा का कप सामने से पूरी तरह खिसक गया था। ब्रा के खिसकते ही उसके दोनों बड़े, गोल-मटोल और गोरे दूध खुले आसमान के नीचे पूरी तरह आज़ाद होकर नीचे लटक गए।
## दूध वाले का दांव
पास ही खड़ा गाँव का एक गठीला और नौजवान दूध वाला, जो कजरी के इस रूप को देखकर काफी देर से मन ही मन मचल रहा था, उसे इस मौके का फायदा उठाने से खुद को रोक नहीं पाया। कजरी ठीक उसके सामने घोड़ी की तरह झुकी हुई थी और उसके दोनों खुले दूध हवा में डोल रहे थे।
दूध वाले ने आव देखा न ताव, उसने फुर्ती से अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए और कजरी के उन भारी, नरम और गोल-मटोल दूध को पूरी तरह अपनी हथेलियों में भर लिया।
जैसे वह रोज़ सुबह अपनी गाय-भैंसों के थनों को पकड़कर दूध निकालता था, ठीक उसी अंदाज़ में उसने कजरी के गोरे दूध के उभारों को अपनी उंगलियों की गिरफ्त में लिया और उन्हें नीचे की तरफ खींचते हुए हल्के-हल्के दुहने लगा। उसकी उंगलियों का दबाव कजरी के बदन की उस मखमली त्वचा पर पड़ रहा था।
## बेबाक समर्पण
इस अचानक हुई छुअन और अपने दूध के दुहे जाने के अहसास से कजरी के मुंह से एक गहरी और मदहोश सिसकारी निकली। लेकिन वह न तो घबराई और न ही उसने सीधा होने की कोशिश की। अपने उसी अलमस्त और चुलबुले अंदाज़ में, वह घोड़ी की तरह झुकी ही रही और अपनी आँखें आधी बंद करके उस दूध वाले को पूरी छूट दे दी।
> "उफ्फ... धीरे दुहो ग्वाले, कहीं सारा दूध आज ही न खत्म हो जाए," कजरी ने झुके-झुके ही अपनी गर्दन मोड़कर, दूध वाले को एक नशीली और शरारती मुस्कान देते हुए बुदबुदाया।
>
दूध वाला उसकी इस बेबाकी से और जोश में आ गया और उसके हाथों की रफ्तार कजरी के बदन पर और गहरी होती गई। मैदान के उस कोने में, बारात की तैयारियों के बीच कजरी का यह सबसे बड़ा और हैरान कर देने वाला तमाशा चल रहा था, जहाँ उसने गाँव की सारी मर्यादा को अपने इस अनोखे अंदाज़ से एक बार फिर हिलाकर रख दिया था।
दूध वाले के हाथों का घर्षण और कजरी के बदन की उत्तेजना अब एक अलग ही मोड़ ले चुकी थी। कजरी अपनी उसी चुलबुली, मदहोश और बेबाक स्थिति में, घोड़ी की तरह आगे झुकी रही। उसकी लाल ब्रा पूरी तरह किनारे हो चुकी थी और उसके दोनों गोरे, गदराए दूध उस नौजवान दूध वाले की मजबूत हथेलियों के बीच पूरी तरह समाए हुए थे।
नौजवान अपनी पूरी ताकत और कुशलता से कजरी के उन कोमल उभारों को नीचे की तरफ खींचते हुए दुहता चला गया। कजरी के बदन में एक मीठी सी सिहरन दौड़ रही थी। उसकी आँखें पूरी तरह मुँद चुकी थीं और उसके गुलाबी होंठों से रह-रहकर हल्की सिसकारियाँ निकल रही थीं। वह अपनी ही धुन में मगन, उस ग्वाले की हर हरकत को महसूस कर रही थी।
> "हाँ काका... निकाल लो सारा रस, आज कजरी को पूरी तरह खाली कर दो..." उसने अपनी रसीली आवाज़ में बुदबुदाते हुए कहा, और अपने चुलबुले अंदाज़ में दूध वाले को अपने जिस्म का सारा सुख और दूध दुह लेने दिया।
>
मैदान के उस कोने में, बारात के ढोल-नगाड़ों की आवाज़ के बीच, कजरी की इस बेबाक बगावत और दीवानगी ने मर्यादा की आखिरी दीवार को भी ढहा दिया था। दूध वाला मदहोशी में डूबकर कजरी के दूध को मचलता रहा और कजरी बिना किसी लोक-लाज के खुद को पूरी तरह सौंप चुकी थी।
दूध वाले ने अपनी पूरी शिद्दत और ताकत से कजरी के उन गोरे, गदराए उभारों को पूरी तरह से दुह लिया। कजरी के बदन का एक-एक कतरा उस छुअन और मदहोशी में डूब चुका था। जब दूध वाले के हाथ आखिरकार थमे, तब तक कजरी का अंग-अंग एक असीम सुकून और थकावट से भर चुका था।
कजरी के चेहरे पर एक गजब की संतुष्टि और खुशी की लहर दौड़ गई। उसने अपनी भारी आँखें खोलीं, अपनी खिसकी हुई लाल ब्रा को जरा सा संभाला, और खुशी-खुशी उस दूधवाले को अपनी ज़हरीली मुस्कान का इनाम दिया, जिसने आज उसकी ज़िद और दीवानगी को एक नया मोड़ दिया था।
लेकिन कजरी का यह हंगामा अभी थमने वाला नहीं था। वह तो जैसे आज पूरे शिवपालपुर को अपने इशारों पर नचाने की कसम खाकर निकली थी।
बिना एक पल भी सीधे खड़े हुए, वह अपनी उसी अलमस्त और चुलबुली 'घोड़ी' वाली पोजीशन में झुकी रही। उसकी काली पैंटी में तने चूतड़ हवा में मटक रहे थे और खुले हुए दूध नीचे डोल रहे थे। इसी अंदाज़ में वह अपनी पायल की छनक बिखेरती हुई, बारात के मैदान में आगे के स्टॉल्स और टेंट की तरफ बढ़ गई, जहाँ गाँव के बाकी लोग और नए तमाशे उसका इंतज़ार कर रहे थे।
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कजरी अपनी उसी अलमस्त धुन में, बिना किसी लोक-लाज के, घोड़ी की तरह आगे की ओर झुकी हुई मटक-मटक कर बढ़ रही थी। बारात के मैदान का माहौल अब पूरी तरह से गरमा चुका था और कजरी का हर एक कदम वहाँ मौजूद लोगों के दिलों की धड़कनें बढ़ा रहा था। घूमते-घूमते वह मैदान के उस छोर पर जा पहुँची जहाँ मांसाहारी मेहमानों के लिए बड़े-बड़े चूल्हों पर मीट पकाया जा रहा था। मसालों की तीखी और सोंधी खुशबू हवा में तैर रही थी।
वहाँ कड़ाही चढ़ाए जो मीट वाला खड़ा था, वह अचानक भारी तनाव में आ गया। बारात में मेहमान उम्मीद से ज़्यादा आ गए थे और कड़ाही में मीट कम पड़ रहा था। वह बड़बड़ा रहा था कि अब इतने कम समय में और मांस कहाँ से लाया जाए।
तभी कजरी ठीक उसकी दुकान के सामने आकर अपनी उसी चुलबुली पोजीशन में और गहरी झुक गई। जब वह झुकी, तो उसकी काली पैंटी में कसे हुए उसके गोल-मटोल, गदराए और भारी चूतड़ ठीक चूल्हे की आंच के पास हवा में पूरी तरह उभर आए। उसकी अठारह साल की जवानी का वह हिस्सा इतना भरा हुआ और सुडौल था कि मीट वाले की निगाहें वहीं टिक गईं।
मीट वाले ने आव देखा न ताव, कड़ाही के कम पड़ते गोश्त की भरपाई करने के लिए उसने अपने बड़े-बड़े मजबूत हाथों को आगे बढ़ाया और कजरी के उन दोनों भारी चूतड़ों को कसकर अपनी गिरफ्त में ले लिया। उसने कजरी के चूतड़ों के मांस को पकड़कर चूल्हे की हल्की आंच की तरफ घुमाया और कड़ाही के मसालों के साथ उन्हें धीरे-धीरे पकाने और सेकने लगा ताकि बारात के लिए मीट की कमी दूर हो सके।
कजरी को इस अजीबोगरीब और तीखे अहसास से एक बार फिर अपने बदन में एक गजब की सिहरन महसूस हुई। आंच की गर्मी और मीट वाले के हाथों का कसना उसके चूतड़ों की त्वचा को पूरी तरह गर्मा रहा था। लेकिन कजरी तो कजरी थी, उसकी शरारत और बेबाकी की कोई सीमा नहीं थी। वह जरा भी पीछे नहीं हटी।
अपने उसी चुलबुले और नटखट अंदाज़ में, वह घोड़ी की तरह झुकी ही रही और अपनी आँखें मूंदकर मीट वाले को पूरी आज़ादी से अपने चूतड़ों का मांस पकाने और सेकने दिया। शिवपालपुर की इस अनोखी बारात में कजरी का यह हंगामा अब सारे कयासों से पार जा चुका था, जहाँ वह अपनी ही मस्ती में खुद को पूरी तरह इस अनोखे खेल में सौंप चुकी थी।
चूल्हे की उस गरमा-गरम आँच पर मीट वाले ने कजरी के गदराए चूतड़ों को अच्छी तरह से सेंक और पका लिया था। कजरी अभी भी उसी चुलबुले अंदाज़ में, बिना किसी दर्द या झिझक के, घोड़ी की तरह आगे झुकी हुई इस अजीबोगरीब खेल का लुत्फ़ उठा रही थी।
जब चूतड़ों का मांस पूरी तरह पक कर तैयार हो गया, तब मीट वाले ने अपना तेज़-तर्रार चाकू उठाया। उसने बेहद सफाई और फुर्ती से कजरी के पके हुए चूतड़ों पर कट लगाना शुरू किया और उसके छोटे-छोटे, मसालेदार टुकड़े अलग कर लिए। ताज्जुब की बात यह थी कि इस पूरी प्रक्रिया में कजरी को कोई तकलीफ नहीं हो रही थी, बल्कि वह अपनी बेबाक मुस्कान बिखेरते हुए आँखें मूंदकर मटक रही थी।
मीट वाले ने उन गरमा-गरम, पके हुए टुकड़ों को प्लेटों में सजाया, उन पर नींबू और चाट मसाला छिड़का, और बारात में आए भूखे मेहमानों को परोसना शुरू कर दिया।
> "वाह भाई वाह! ऐसा उम्दा और रसीला कबाब तो पूरी जिंदगी में नहीं खाया! इसमें कौन सा गुप्त मसाला डाला है?" एक शराबी मेहमान ने प्लेट चाटते हुए मीट वाले से पूछा।
>
मीट वाले ने हँसते हुए कजरी की तरफ इशारा किया, जो अभी भी काउंटर के सामने झुकी हुई अपनी इस अनोखी बगावत का जश्न मना रही थी। शिवपालपुर की इस ऐतिहासिक बारात में कजरी खुद अपनी जवानी और शरारत से पूरे गाँव की दावत का जरिया बन चुकी थी, और इस हंगामे की गूँज बारात बीतने के बाद भी सदियों तक थामी नहीं जानी थी।
मीट वाले ने कजरी के चूतड़ों का आखिरी टुकड़ा भी प्लेट में सजाकर मेहमानों को परोस दिया। पूरी बारात उंगलियाँ चाट-चाटकर कजरी की उस बेबाक जवानी के स्वाद की तारीफ कर रही थी। उधर कजरी, जिसका आधा धड़ अब गायब हो चुका था, इस अतियथार्थवादी और जादुई दुनिया के नियमों के मुताबिक बिना किसी दर्द या खून के, अपनी उसी पुरानी मस्ती में चूर थी।
चूतड़ पूरी तरह खत्म हो जाने के बाद भी उसकी रूह और उसकी शरारत का वही अल्हड़ अंदाज़ बाकी था। उसने अपनी कमर को एक आखिरी बार हवा में झटका, अपनी बची-कुची पैंटी को संभाला और खुशी-खुशी मीट वाले को अपनी जादुई मुस्कान दी।
वह रुकी नहीं। बिना सीधे खड़े हुए, वह अपने उसी चुलबुले और नटखट 'घोड़ी' वाले अंदाज़ में आगे की तरफ झुकी-झुकी ही मटकती हुई मैदान में आगे बढ़ गई।
उसकी लाल ब्रा से लटकते उसके दूध अब भी हवा में डोल रहे थे, और वह अपनी पायल की छनक से पूरे शिवपालपुर को यह बताने के लिए आगे बढ़ रही थी कि कजरी को पूरी तरह खत्म करना किसी के बस की बात नहीं। बारात के अगले टेंट में अब कोई और ही अनोखा कौतुक उसका इंतज़ार कर रहा था।
कजरी का यह सफर अब वास्तविकता की सभी सीमाओं को लांघकर एक अजीबोगरीब और अतियथार्थवादी लोक-कथा का रूप ले चुका था। पीछे चूतड़ न होने की वजह से उसकी काली पैंटी का अस्तित्व भी खत्म हो चुका था, जिसके कारण आगे का हिस्सा पूरी तरह से अनावृत हो गया था। जब वह घोड़ी की तरह झुकी हुई आगे बढ़ रही थी, तो उसके बदन का वह सबसे निजी और गुप्त हिस्सा, उसकी योनि की कोमल पंखुड़ियाँ, वहाँ मौजूद सभी लोगों के सामने पूरी तरह से नंगी हो चुकी थीं।
बारात के मैदान में कड़ाही की आँच, ढोल-नगाड़ों की थाप और रोशनी के बीच कजरी का यह रूप देखकर वहाँ खड़े लोगों की आँखें फटी की फटी रह गईं। गाँव के मर्द, हलवाई और मेहमान जो अब तक सिर्फ उसकी ब्रा और पैंटी को देखकर हैरान-परेशान थे, वे अब इस पूरी तरह से बेपर्दा और हैरान कर देने वाले नज़ारे को देखकर एकदम सन्न रह गए थे।
लेकिन कजरी को जैसे इस बात की कोई परवाह ही नहीं थी कि उसने समाज की मर्यादा और लोक-लाज के आखिरी धागे को भी तोड़कर फेंक दिया है। वह अपने उसी चिर-परिचित, चुलबुले और बेबाक अंदाज़ में अपनी आँखें मटकाती हुई, बिना किसी झिझक के आगे बढ़ती जा रही थी, मानो वह पूरे शिवपालपुर गाँव को उसकी अपनी बनाई बंदिशों और सोच पर चिढ़ा रही हो। उसकी पायल की छनक अभी भी मैदान के उस कोने में गूंज रही थी, जहाँ वह अपने इस नए और सबसे बोल्ड तमाशे के साथ अगले पड़ाव की तरफ बढ़ रही थी।
बारात के मैदान में अपने हुस्न और बेबाकी का आखिरी तमाशा दिखाने के बाद, कजरी को लगा कि आज के लिए इतना हंगामा काफी था। सूरज ढल चुका था और बारात की रौनक अपने शबाब पर थी, लेकिन कजरी अब इस अजीबोगरीब जादूगरी के खेल से थोड़ा थक चुकी थी।
वह अपनी उसी अलमस्त चाल में मटकती हुई, बिना किसी पाबंदी की परवाह किए सीधे अपने घर की तरफ चल पड़ी। रास्ते में जो भी उसे इस हाल में देख रहा था, वह बस देखता ही रह गया, लेकिन कजरी अपनी ही धुन में मुस्कुराती रही।
घर पहुँचकर उसने रसोई में रखी अपनी मनपसंद चीजें और गरमा-गरम खाना पेट भरकर खाया। दिनभर की भाग-दौड़, हलवाइयों की चपत, गरम चिमटे की छुअन और पूरे गाँव को हिला देने वाले अपने कारनामों के बाद उसका बदन अब आराम माँग रहा था।
उसने बिस्तर पर लेटकर एक लंबी और गहरी साँस ली। अपनी आँखें मूंदते ही उसके चेहरे पर वही चिर-परिचित, चुलबुली और नटखट मुस्कान एक बार फिर तैर गई। शिवपालपुर गाँव को अपनी उँगलियों पर नचाने वाली अठारह साल की कजरी अब चादर तानकर चैन की नींद सो चुकी थी, यह जानते हुए कि कल की सुबह गाँव में एक नया सूरज और उसकी शरारतों का एक नया बवंडर लेकर आएगी।
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## अध्याय: सुबह की ताजगी और तालाब का सन्नाटा
रात भर की गहरी और सुकून भरी नींद के बाद जब शिवपालपुर में अगली सुबह का सूरज उगा, तो कजरी के बदन की सारी थकान गायब हो चुकी थी। कल रात बारात के मैदान में जो कुछ भी हुआ—चाहे वो हलवाइयों के कौतुक हों या उसकी बेबाक आज़ादी—वह सब अब गाँव के लोगों के लिए एक किंवदंती बन चुका था। लेकिन कजरी के लिए हर दिन एक नई शुरुआत थी।
सुबह की हल्की ठंडक और शांत माहौल में कजरी अपनी उसी अलमस्त चाल से गाँव के पुराने तालाब की तरफ चल पड़ी। इस वक्त वहाँ दूर-दूर तक कोई नहीं था। चारों तरफ सिर्फ पंछियों की चहचहाहट और पानी की शांत लहरें थीं।
बिना किसी हिचक या लोक-लाज के, कजरी ने अपने बदन से लाल ब्रा की उस आखिरी पट्टी को भी उतार फेंका। अब उसके बदन पर न तो कोई कपड़ा था और न ही समाज की कोई बंदिश। वह पूरी तरह नंगी होकर, अपनी अल्हड़ और बेबाक जवानी के साथ तालाब के ठंडे पानी में उतर गई।
## जलपरी का रूप
जैसे ही पानी कजरी के गोरे और सुडौल बदन को छूते हुए उसके गले तक पहुँचा, उसके मुंह से एक ठंडी सिहरन भरी सिसकारी निकल गई। वह पानी में तैरती हुई किसी आज़ाद जलपरी जैसी लग रही थी। जब वह पानी से ऊपर उठती, तो सुबह की पहली किरणें उसके भीगे हुए गोरे कंधों और खुले हुए दूध पर चमक उठतीं, जिससे पानी की बूंदें मोतियों की तरह टूटकर वापस तालाब में गिरतीं।
> कजरी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और पानी की लहरों को अपने बदन से लिपटने दिया। उसे इस बात का कोई खौफ नहीं था कि कोई उसे देख लेगा; वह तो बस प्रकृति के इस शांत रूप में खुद को पूरी तरह डूबो देना चाहती थी।
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वह कभी पानी में डुबकी लगाती, तो कभी अपनी टांगों को हवा में उछालकर पानी की बौछारें उड़ाती। कल रात के हंगामे के बाद, आज की यह सुबह कजरी के लिए अपनी ही धुन में जीने का एक और नया और बेबाक जरिया बन चुकी थी, जहाँ शिवपालपुर का यह पुराना तालाब उसकी आज़ादी का गवाह बना खड़ा था।
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## अध्याय: तालाब पर नया कौतुक
सुबह की उस शांत बेला में कजरी अभी पानी की लहरों का आनंद ले ही रही थी कि तभी गाँव के कुछ लड़के और मर्द खेतों की तरफ जाने के लिए उसी रास्ते से गुज़रे। तालाब के ठंडे पानी में हलचल और छपाक की आवाज़ सुनकर जैसे ही उन्होंने मुड़कर देखा, उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई और चेहरों पर एक अजीब सी खुशी दौड़ गई।
कजरी बिना किसी हिजाब के, पूरी तरह नंगी होकर पानी में अठखेलियाँ कर रही थी। सुबह की उजली धूप में उसका भीगा हुआ बदन साफ चमक रहा था। वहाँ से गुज़रने वाले लोग अपनी आँखें फाड़े, पलकें झपकाना भूलकर वहीं ठहर गए।
## निशानों पर टिकी नज़रें
उन लोगों की भूखी और हैरान नज़रें कजरी के बदन के एक-एक हिस्से का मुआइना करने लगीं:
* **गोल-मटोल दूध और निप्पल:**
जब कजरी पानी से थोड़ा ऊपर उठती, तो उसके दोनों भारी, गोरे दूध पानी की सतह पर तैरते हुए साफ नज़र आते। ठंड और पानी के अहसास से कड़क हो चुके उसके गहरे रंग के निप्पल उन उभारों के बीच अलग ही तान पैदा कर रहे थे, जिन्हें देखकर किनारे खड़े लोगों के हलक सूख रहे थे।
* **योनि की नग्नता:**
पानी की पारदर्शी लहरों के नीचे से उसकी योनि का वह हिस्सा, जो कल रात से ही पूरी तरह अनावृत था, सबकी नज़रों के सामने नंगा था।
लेकिन जैसे ही उन लोगों की निगाहें कजरी के पिछले हिस्से की तरफ गईं, वे एक पल के लिए चकरा गए। इस अतियथार्थवादी दुनिया के अजूबे के मुताबिक, कजरी के पास चूतड़ थे ही नहीं! कल रात बारात में मीट वाले ने उसके चूतड़ों का मांस पकाकर पूरी बारात को जो खिला दिया था। पीछे का हिस्सा पूरी तरह सपाट और गायब था, लेकिन इस अजीबोगरीब बनावट के बावजूद कजरी के चेहरे की रौनक और उसका चुलबुलापन रत्ती भर भी कम नहीं हुआ था।
## बेबाक मुस्कान
किनारे पर खड़े लोगों को इस तरह आँखें सेकते और अपनी तरफ टकटकी लगाए देख कजरी जरा भी नहीं शर्माई। उसने पानी में ही गोल घूमकर एक ज़ोरदार डुबकी लगाई और अपनी भीगी जुल्फों को झटकते हुए उन राहगीरों की तरफ देखकर एक कातिलाना आँख मारी।
> "काहे हो भाइयों? सुबह-सुबह खेत जाने का इरादा बदल गया क्या, या यहीं तालाब पर ही अपनी भैंस धोने का मन है?" कजरी ने पानी में से ही खिलखिलाकर हँसते हुए तंज़ कसा।
>
उसकी इस बेबाक आवाज़ और जादुई बदन के दीदार ने सुबह-सुबह ही उन गाँव वालों के दिलों में एक नया तूफ़ान खड़ा कर दिया था, और कजरी हमेशा की तरह अपने नए रूप के साथ इस पूरे नज़ारे का लुत्फ़ उठा रही थी।
कजरी की इस बेबाक अदा और पूरी तरह से नग्न बदन को देखकर किनारे खड़े मर्दों का सब्र आखिरकार पूरी तरह से टूट गया। सुबह की उस शांत बेला में, कजरी का यह अनोखा और आमंत्रण देता रूप देखकर उनमें से एक हट्टा-कट्टा नौजवान अपनी वासना पर काबू नहीं रख पाया। उसने बिना सोचे-समझे अपने कपड़े उतारे और एक ज़ोरदार छपाक के साथ तालाब के ठंडे पानी में कूद पड़ा।
वह तैरता हुआ तेजी से कजरी के पास पहुँचा। कजरी अपनी उसी चुलबुली मुस्कान के साथ पानी में खड़ी रही, मानो वह उसी का इंतज़ार कर रही थी। उस नौजवान ने पानी के अंदर ही कजरी के भीगे और चिकने बदन को अपनी मजबूत बाहों में भरा और उसे उठाकर सीधे अपनी गोद में बिठा लिया। चूतड़ न होने की वजह से कजरी का निचला हिस्सा सीधे उस मर्द के तने हुए शरीर के संपर्क में आ गया।
नौजवान ने बिना एक पल गंवाए अपने कड़क और गरम लिंग को कजरी की भीगी हुई, खुली योनि के मुहाने पर टिकाया और एक ही झटके में उसे पूरा अंदर घुसेड़ दिया।
"उफ्फ्फ्..." पानी की ठंडक के बीच उस गरम और तीखे अहसास से कजरी के मुंह से एक गहरी सिसकारी निकली।
नौजवान ने कजरी की पतली कमर को दोनों हाथों से कसकर पकड़ा और पानी के अंदर ही उसे अपनी गोद में हिलाते हुए नीचे से ऊपर की तरफ ज़ोर-ज़ोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए। हर धक्के के साथ तालाब का पानी छपाक-छपाक की आवाज़ के साथ हवा में उछल रहा था और कजरी के खुले, भारी दूध उस नौजवान की छाती से टकराकर ऊपर-नीचे डोल रहे थे।
कजरी इस अचानक और तीव्र अहसास से पूरी तरह मदहोश हो गई। उसने डरने या विरोध करने के बजाय अपने दोनों हाथ उस नौजवान के गले में डाल दिए और अपने पैरों को उसकी कमर के चारों तरफ लपेट लिया। वह अपनी आँखें बंद करके, हर धक्के के साथ अपने सिर को पीछे की तरफ झुकाती और इस चरम सुख के पल को पूरी तरह से एंजॉय करने लगी। तालाब का वह कोना अब बारात के हंगामे के बाद कजरी की कामुकता और दीवानगी के एक नए अध्याय का गवाह बन रहा था।
पानी के अंदर धक्कों की रफ्तार और भी तेज हो गई। वह नौजवान पूरी ताकत से कजरी को अपनी गोद में उछाल रहा था, जिससे तालाब का शांत पानी चारों तरफ छपाक-छपाक की तेज आवाज़ के साथ बिखरने लगा। कजरी का भीगा बदन हर झटके के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था, और उसकी बिखरी हुई भीगी जुल्फें उसके चेहरे और कंधों पर लहरा रही थीं।
तभी, पानी की छपाछप और कजरी की सिसकारियों के बीच एक तीखी और गहरी आवाज आई, मानो कोई महीन पर्दा एक झटके में पूरी तरह फट गया हो। कजरी की योनि के भीतर से उसकी सील टूटने की वह आखिरी और स्पष्ट आवाज़ गूंज उठी।
इस अचानक हुए तीखे बदलाव और भीतरी खिंचाव से कजरी के मुंह से एक लंबी, दर्द और मखमली सुख से भरी चीख निकल गई। उसने उस नौजवान के मजबूत कंधों को अपने नाखूनों से कसकर दबोच लिया। लेकिन इस बदले हुए अहसास ने कजरी की दीवानगी को कम करने के बजाय और बढ़ा दिया। वह अपनी आँखें मीचे, उस तीखेपन को सहते हुए और गहरे से उस नौजवान के बदन से चिपक गई, मानो वह इस नए और चरम अनुभव को अपने भीतर पूरी तरह समो लेना चाहती हो।
नौजवान के धक्कों की रफ्तार अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी। तालाब का पानी दोनों के शरीरों की इस तीव्र हलचल से बुरी तरह से उफन रहा था। कजरी उस नौजवान की बाहों में पूरी तरह कस चुकी थी और हर झटके के साथ उसका अंग-अंग सिहर रहा था।
तभी, उस तीखे और चरम वेग के साथ नौजवान का पूरा शरीर अकड़ गया और उसका सारा गर्म बीज एक झटके में कजरी की कोख की गहराइयों में उतरने लगा। पानी के भीतर उस गरमाहट के फैलते ही कजरी के पूरे बदन में करंट सा दौड़ गया। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और एक लंबी, मदहोश सिसकारी छोड़ते हुए इस असीम सुख के पल को पूरी तरह से एंजॉय किया।
शिवपालपुर के उस तालाब के शांत पानी में, सुबह की पहली किरणों के बीच कजरी का यह अनोखा और बेबाक सफर अपनी संतुष्टि के एक नए शिखर पर पहुँच चुका था।
नौजवान के शरीर का पूरा वेग शांत होने के बाद दोनों के बीच का वह तीव्र शारीरिक संबंध अपनी पूर्णता को पहुँचा। नौजवान के चेहरे पर एक गहरी जीत और संतुष्टि की मुस्कान थी। वह मन ही मन बेहद खुश और गौरवान्वित महसूस कर रहा था कि उसने पूरे शिवपालपुर को अपनी उँगलियों पर नचाने वाली, सेक्स से भरपूर और अलमस्त कजरी के जिस्म का सुख पूरी तरह से भोग लिया था।
अपनी प्यास बुझाने के बाद, उसने कजरी को पानी में धीरे से छोड़ा, तालाब से बाहर निकला और किनारे पर रखे अपने कपड़े पहनने लगा। कजरी अभी भी पानी में शांत लेटी हुई, अपनी आँखें मूँदे उस चरम संतुष्टि के खुमार को महसूस कर रही थी।
नौजवान ने एक आखिरी बार मुस्कुराते हुए कजरी के उस भीगे बदन को देखा, अपने साथियों को इशारा किया, और फिर वे सब हंसते-खिलखिलाते हुए खेतों की तरफ आगे बढ़ गए। तालाब पर एक बार फिर सुबह का वही सन्नाटा लौट आया था, और कजरी पानी की लहरों के बीच अपनी ही एक नई दुनिया में मगन थी।
नौजवान के जाने के बाद भी तालाब के ठंडे पानी में कजरी का बदन शांत नहीं हुआ था। पानी की मंद लहरों के बीच कजरी वैसे ही चित्त लेटी रही, उसकी आँखें आधी खुली थीं और आसमान की नीलिमा को निहार रही थीं। तभी अचानक, उसकी योनि के भीतर से हल्के और गहरे झटके उठने शुरू हुए।
वह गर्म बीज, जो नौजवान ने उसकी कोख के मुहाने पर छोड़ा था, वह अभी पूरी तरह अंदर नहीं समाया था। वह धीरे-धीरे, अपनी ही गति से कजरी के बदन की गहराइयों में सरक रहा था। हर बार जब वह गाढ़ा द्रव आगे बढ़ता, कजरी के गर्भाशय के भीतर एक तीव्र और मीठी सिहरन पैदा होती, जिससे उसका निचला हिस्सा पानी के अंदर ही रुक-रुक कर कांप उठता।
कजरी ने इस अनोखे और रसीले अहसास को रोकने की कोई कोशिश नहीं की। वह उसी तरह पूरी तरह नंगी होकर तालाब के पानी में तैरती रही, धूप की किरणें उसके भीगे दूध और खड़े हुए निप्पलों पर चमक रही थीं। उसने एक गहरी और संतुष्ट सांस ली और अपनी कमर को थोड़ा और ढीला छोड़ दिया, ताकि उस नौजवान का एक-एक कतरा और सारा बीज बिना किसी रुकावट के, धीरे-धीरे उसकी कोख में पूरी तरह उतर जाए।
प्रकृति के इस खुले आंचल में, बिना किसी लोक-लाज के, कजरी इस धीमे और जादुई चरमसुख के एक-एक पल को अपने भीतर समेटते हुए बेहद खुश थी।
तालाब के ठंडे पानी में हलचल अब पूरी तरह शांत हो चुकी थी। कजरी के भीतर उठने वाले वे धीमे और तीखे झटके भी आखिरकार थम गए, जब उस नौजवान के पौरुष का आखिरी कतरा भी उसकी कोख की गहराइयों में पूरी तरह समा गया। कजरी ने पानी के भीतर ही एक लंबी, गहरी और परम संतुष्टि की सांस ली। उसकी आँखें खुलीं, और उसने सुबह के साफ आसमान को देखते हुए अपने चिर-परिचित चुलबुले अंदाज़ में एक गहरी मुस्कान बिखेरी। उसके भीगे, गोरे बदन पर अब एक अजीब सी शांति और तृप्ति छा चुकी थी।
## नौजवान का घर लौटना
उधर, तालाब से दूर गाँव की एक शांत गली में स्थित अपने घर की ओर वह नौजवान बढ़ चुका था। जैसे ही उसने अपने कमरे का दरवाज़ा खोला, उसकी दुनिया पूरी तरह बदल गई। कमरे के भीतर उसकी पत्नी सुबह के कामकाज निबटाकर बच्चों को तैयार कर रही थी, और बच्चे अपनी मासूम आवाज़ों में चहक रहे थे।
बाहर की दुनिया के सारे हंगामे और मर्यादा की सीमाओं को लांघने के बाद, वह नौजवान अब वापस अपने सामाजिक और पारिवारिक दायरे में लौट आया था।
## एक गुप्त संतुष्टि
अपनी पत्नी और बच्चों के बीच पहुँचकर भी उस नौजवान के दिमाग में रह-रहकर तालाब का वह मंज़र कौंध रहा था। वह मन ही मन बेहद खुश और गौरवान्वित महसूस कर रहा था। उसके भीतर एक अजीब सा गुप्त अहंकार और संतोष था कि उसने पूरे शिवपालपुर की सबसे चर्चित, अल्हड़ और सेक्स से भरपूर कजरी के जिस्म को पूरी तरह से भोग लिया था।
> उसने अपनी पत्नी की तरफ देखा और बच्चों को गोद में उठा लिया, लेकिन उसके चेहरे की वह छिपी हुई मुस्कान गवाही दे रही थी कि कजरी के साथ बिताए वे जादुई और तीव्र पल अब हमेशा के लिए उसकी यादों का एक सबसे गहरा और कामुक हिस्सा बन चुके थे।
>
शिवपालपुर की सुबह अब पूरी तरह से परवान चढ़ चुकी थी, जहाँ एक तरफ कजरी अपनी आज़ादी के नए खुमार में डूबी थी, तो दूसरी तरफ उसे भोगने वाला समाज के नियमों के बीच वापस अपनी जिंदगी में लौट चुका था।
तालाब के ठंडे पानी और उस मुकम्मल संतुष्टि के बाद, कजरी के बदन की सिहरन अब एक ताज़ा स्फूर्ति में बदल चुकी थी। उसने पानी से बाहर कदम रखा, जहाँ सुबह की धूप ने उसके भीगे और निथरे हुए बदन को पल भर में सुखा दिया। अपनी उसी चिर-परिचित बेबाकी और अल्हड़ अंदाज़ में उसने ज़मीन पर पड़े अपने कपड़े उठाए। कजरी ने सबसे पहले अपनी वही लाल ब्रा पहनी, जिसने उसके गोल-मटोल और भारी दूधों को फिर से एक टाइट उभार दे दिया। इसके बाद उसने अपनी पैंटी को ऊपर खींचा। चूतड़ न होने की वजह से पैंटी का पिछला हिस्सा एकदम सपाट बैठ गया था, लेकिन आगे से उसकी योनि की पंखुड़ियाँ अब दोबारा कपड़े की सुरक्षित आगोश में छिप चुकी थीं।
अपने बाकी कपड़े पहनकर और भीगे बाल झटकते हुए वह गुनगुनाती हुई आगे बढ़ गई। तालाब का वो कामुक सन्नाटा पीछे छूट चुका था और अब वह गाँव की पगडंडियों पर अपनी पायल छनकाती हुई चल रही थी।
## अमराई में बच्चों की टोली
गाँव के छोर पर स्थित बड़े से आम के बगीचे में धूप छनकर आ रही थी। वहाँ गाँव के बच्चों की एक टोली पहले से ही जमा थी, जो पेड़ों पर लटके कच्चे और पके आमों को ललचाई नज़रों से देख रही थी।
कजरी को दूर से आते देख बच्चे खुशी से चिल्लाए, "अरे, कजरी दीदी आ गई! अब आएगा मज़ा!"
कजरी के भीतर की चुलबुली और नटखट लड़की तुरंत जाग उठी। उसने अपनी साड़ी का पल्लू कसकर कमर में खोंसा, जिससे उसकी पतली कमर और ब्रा में कसे हुए उभरे दूध साफ नुमायां हो रहे थे।
> "हटो-हटो तुम सब! ऐसे कंकड़ मारने से आम नहीं गिरते। देखो तुम्हारी कजरी दीदी कैसे निशाना लगाती है!" कजरी ने हँसते हुए एक बड़ा सा पत्थर उठाया।
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## आम तोड़ने का हुड़दंग
कजरी बच्चों के बीच पूरी तरह बच्चा बन गई। वह अपनी पूरी ताकत से पेड़ों की घनी डालियों पर कंकड़ उछालने लगी। जब एक बड़ा, सिंदूरी आम सीधे आकर नीचे गिरा, तो बच्चे तालियाँ बजाकर झपट पड़े।
* **चुलबुली दीवानगी:**
आम तोड़ने की इस आपाधापी में जब कजरी ऊपर डालियों की तरफ हाथ उठाती, तो उसका कुर्ता ऊपर खिसक जाता और उसकी गोरी नाभि और बदन का लचीलापन बच्चों की टोली के बीच एक अजीब सा रंग भर देता।
* **मस्ती और दावत:**
कुछ ही देर में कजरी और बच्चों ने मिलकर ढेरों आम नीचे गिरा लिए। कजरी वहीं ज़मीन पर बैठ गई और बच्चों के साथ मिलकर कच्चे आमों को दांतों से छीलकर खाने लगी।
सुबह तालाब में जो कुछ भी हुआ था, कजरी उसे पीछे छोड़ चुकी थी। वह वर्तमान के इस बेहद साधारण और खुशियों भरे पल को पूरी तरह जी रही थी, जहाँ आम की मिठास और बच्चों की हँसी के बीच शिवपालपुर की यह सबसे अनोखी लड़की एक बार फिर अपनी मस्ती के चरम पर थी।
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बगीचे में बच्चों के साथ आम तोड़ने और हुड़दंग मचाने के बाद, कजरी का मन अब शांत हो चुका था। दोपहर ढलने लगी थी, इसलिए वह अपनी उसी मटकती हुई अलमस्त चाल में वापस अपने घर की तरफ चल पड़ी।
घर के आंगन में कदम रखते ही उसने देखा कि उसकी माँ रसोई के बाहर बैठी शाम के खाने की तैयारी और घर के बाकी कामों में जुटी हुई थी। कल रात की बड़ी बारात और आज सुबह तालाब के तमाम कौतुकों के बाद, कजरी अब पूरी तरह से एक घरेलू और संस्कारी बेटी के रूप में अपनी माँ के पास जाकर बैठ गई।
## माँ-बेटी की बातचीत और काम
कजरी को इस तरह अचानक सीधे घर आकर बैठते देख माँ ने थोड़ा हैरान होकर मुस्कुराते हुए कहा:
> "अरे कजरी! आज बड़ा सूरज कहाँ से उगा है जो तू इतनी जल्दी घर लौट आई? नहीं तो पूरा दिन तो तेरा पूरे शिवपालपुर में हुड़दंग मचाने में ही बीत जाता है।"
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कजरी ने अपनी चुलबुली आँखें मटकाईं और अपनी माँ के गले में बाहें डालते हुए बोली, "धुर्र माँ! अपनी बेटी को हमेशा ताना ही मारती रहती हो। लाओ, बताओ क्या काम करना है, आज मैं तुम्हारी पूरी मदद करूँगी।"
* **सब्जी काटना:**
कजरी ने तुरंत पास पड़ी दरांती और टोकरी उठाई और रात के खाने के लिए आलू और हरी सब्जियां फटाफट काटने लगी।
* **अनाज साफ करना:**
सब्जी काटने के बाद, उसने माँ के साथ मिलकर सूपे में गेहूं और दाल साफ करना शुरू किया। जब वह सूपे को हवा में झटकती, तो उसकी चूड़ियों और पायल की खनक पूरे शांत आंगन में गूंज उठती।
## आंगन का शांत माहौल
भले ही कजरी का बदन कल रात और आज सुबह के अजीबोगरीब वाकयों (बिना चूतड़ के सपाट हिस्सा और कोख में समाया बीज) के दौर से गुज़रा था, लेकिन इस वक्त अपनी माँ के बगल में बैठकर काम करते हुए उसके चेहरे पर एक असीम सुकून और सादगी थी। माँ अपनी धुन में घर गृहस्थी की बातें कर रही थी और कजरी बीच-बीच में हाँ-हूँ करते हुए अपनी चिर-परिचित नटखट मुस्कान बिखेर रही थी।
शिवपालपुर की सबसे बेबाक और बोल्ड लड़की अब अपने घर के शांत आंगन में एक आम ग्रामीण बेटी की तरह शाम के चूल्हे की तैयारी में हाथ बंटा रही थी।
शाम ढलते-ढलते घर का सारा काम सिमट चुका था। चूल्हे से उठती गरम-गरम रोटियों और सब्जी की सोंधी खुशबू पूरे आंगन में फैल रही थी। तभी दरवाजे पर भारी कदमों की आहट हुई और कजरी के पिताजी खेतों का काम निपटाकर घर लौट आए। दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद उनके चेहरे पर थकान तो थी, लेकिन अपनी पत्नी और बेटी को इस तरह आंगन में साथ बैठे देख उनकी सारी थकान जैसे पल भर में गायब हो गई।
कजरी ने तुरंत उठकर अपने पिताजी को पीने के लिए ठंडा पानी दिया और उनका हालचाल पूछा। पिताजी अपनी इस लाडली बेटी की सेवा देखकर मन ही मन बेहद खुश हुए।
## परिवार का साथ और रात्रिकालीन भोज
माँ ने बिना देर किए आंगन में ही टाट की बोरी बिछाई और थालियों में गरमा-गरम खाना परोस दिया।
* **स्नेहपूर्ण माहौल:**
कजरी, उसकी माँ और पिताजी, तीनों एक साथ बैठकर रात का खाना खाने लगे। बातचीत के दौरान कजरी ने बगीचे में बच्चों के साथ आम तोड़ने वाली शरारतों का ज़िक्र तो किया, लेकिन सुबह तालाब की उस गुप्त घटना और अपने बदन के अनोखे बदलावों को पूरी तरह छिपाए रखा।
* **पारिवारिक तृप्ति:**
पिताजी ने कजरी के हाथ की कटी सब्जियों के स्वाद की तारीफ की, जिससे कजरी का चेहरा खुशी से खिल उठा। सबने भरपेट खाना खाया और भगवान का शुक्रिया अदा किया।
## बिस्तर पर आराम और सुकून की नींद
खाना खाने के बाद कजरी ने बर्तन समेटे और माँ ने बिस्तर ठीक किए। शिवपालपुर के आसमान में अब चंदा मामा अपनी पूरी चांदनी बिखेर रहे थे और रात की ठंडी, शांत हवाएं चल रही थीं।
दिनभर की अठखेलियों, तालाब के उस तीव्र शारीरिक मिलन और शाम की घरेलू मेहनत के बाद कजरी का शरीर अब पूरी तरह विश्राम चाह रहा था। पिताजी अपने कमरे में और माँ-बेटी अपने बिस्तर पर जाकर लेट गए।
जैसे ही कजरी ने बिस्तर पर करवट ली, उसकी कोख में समाए उस नौजवान के बीज की गरमाहट ने उसे एक अजीब सा सुकून दिया। उसने अपनी आँखें मूंद लीं और चादर तानकर आराम करने लगी। कुछ ही पलों में पूरा परिवार गहरी और शांत नींद के आगोश में समा गया, और कजरी के चेहरे पर वही चिर-परिचित, रहस्यमयी और चुलबुली मुस्कान तैरती रही।
उधर, गाँव के दूसरे छोर पर बने उस शांत घर में भी रात का सन्नाटा पूरी तरह पसर चुका था। तालाब के उस तूफानी और तीखे वाकये के बाद, वह नौजवान अब पूरी तरह से अपने सांसारिक और पारिवारिक जीवन के दायरे में वापस लौट आया था।
कमरे के भीतर हल्की ढलती रोशनी में उसकी पत्नी और बच्चे बिस्तर पर चैन की नींद सो रहे थे। नौजवान भी उनके बगल में लेटा हुआ था। दिनभर की भागदौड़ और खेतों के काम के बाद उसका शरीर थका हुआ था, लेकिन जब उसने करवट बदली, तो उसके ज़ेहन में एक बार फिर सुबह का वह पूरा नज़ारा तैर गया—कजरी का वह पूरी तरह नंगा और बेबाक बदन, पानी की छपाक, और उसकी कोख में अपना सारा बीज उतार देने का वह चरम सुख।
उसने अपनी सोती हुई पत्नी और मासूम बच्चों की तरफ देखा। उसके दिल में एक अजीब सी संतुष्टि थी; एक तरफ उसका यह सुरक्षित, शांत और सामाजिक परिवार था, और दूसरी तरफ कजरी के साथ बिताया वह गुप्त, रोमांचक और आदिम पल, जिसे उसने हमेशा के लिए अपने भीतर दफन कर लिया था।
एक गहरी और लंबी सांस लेकर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। अपनी पत्नी के हाथ की छुअन और बच्चों की धीमी सांसों के बीच, वह नौजवान भी गहरी नींद के आगोश में समा गया, यह जानते हुए कि शिवपालपुर की यह रात उन दोनों के जीवन में एक ऐसा राज़ छोड़ गई है जो सिर्फ उस पुराने तालाब और उनके जिस्मों को मालूम था।
रात और गहरी हो चुकी थी। शिवपालपुर गाँव पूरी तरह से सन्नाटे की चादर ओढ़े सो रहा था। कजरी के घर के आंगन में भी अब केवल हवा की सरसराहट और दूर कहीं झींगुरों की आवाज़ गूंज रही थी।
कमरे के भीतर, कजरी अपने माता-पिता के साए में पूरी सुरक्षा और सुकून के साथ बिस्तर पर लेटी हुई थी। दिनभर के सारे रंग, चाहे वह तालाब की बेबाक आज़ादी हो, कोख में समाई वह अनजानी गरमाहट हो, या फिर बच्चों के साथ बगीचे का हुड़दंग—सब कुछ अब पीछे छूट चुका था। इस वक्त वह सिर्फ अपने माता-पिता की वही लाडली और चंचल बेटी थी, जो दुनिया की सारी फिक्र भूलकर सोती थी।
पास ही के बिस्तरों पर उसके माता-पिता भी गहरी और शांत नींद में थे। कजरी ने करवट ली और चादर को थोड़ा और ऊपर खींच लिया। उसके चेहरे पर फैली वह शांत और नटखट मुस्कान अब नींद के आगोश में पूरी तरह स्थिर हो चुकी थी। एक अनोखे और उतार-चढ़ाव से भरे दिन के अंत में, कजरी अपने परिवार के बीच एकदम सुरक्षित और चैन की नींद सो गई थी, और इसके साथ ही शिवपालपुर की यह रहस्यमयी रात अपनी पूर्णता को पहुँच गई।
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